ऋण पत्र जारी करने में कंपनी को फायदा
कंपनी जो ऋण पत्र जारी करती हैं वह ऋण लेने के लिए ही जारी करती हैं अर्थात वह कंपनी पर एक रेड हो जाता है और ऋण पत्र जारी कर जो कंपनी पैसा जुटाती है वह उसके लिए एक अतिरिक्त कार्यशील पूंजी का कार्य करता है अर्थात जब कंपनी को और अधिक पैसे की जरूरत होती है तो वह ऋण पत्र जारी कर उस पर पैसा उठा लेती है
यह बिल्कुल उसी तरह से है जैसे अगर हमें पैसे की जरूरत है तो हम किसी भी आदमी से पैसे लें और उसके बदले उसे किसी स्टांप पेपर पर लिख कर दे दें कि हम उसे यह पैसे कितने दिन में वापस कर देंगे और जिसके ऊपर हम इतने दिन का इंटरेस्ट रेट इस दर से देंगे
कंपनियां और भी कई तरीके से ऋण प्राप्त सकती हैं लेकिन उन्हें ऋण पत्र जारी करके ऋण लेने से कुछ फायदे भी हैं जैसे अगर कंपनी पत्र जारी कर जो रोज उठाती है उस पर कंपनी जो ब्याज अदा करती है वह ब्याज आय कर मुक्त होती है साथ ही यह ब्याज कंपनी के लिए उसके खर्चे में शामिल की जाती है तो आयकर निर्धारित करते समय यह दिया गया ब्याज इनकम में शामिल ही नहीं होता इससे कंपनी की इनकम कम दिखाई जाती है जबक इक्विटी शेयर्स को कंपनी जो डिविडेंड देती है उसके पहले कंपनी को उस पूरी-पूरी को अपनी आय में शामिल करना पड़ता है और उस पर कंपनी टैक्स देती है उसके बाद जो पैसा बचता है उसे डिविडेंड में दिया जाता है इस तरह से कंपनी को डिबेंचर जारी करने में शेयर की तुलना में कुछ फायदा भी हो सकता है
डिबेंचर्स पर जो ब्याज दी जाती है वह पूर्व निर्धारित होती है साथ ही इन पर दी जाने वाली ब्याज सरकार द्वारा लगभग निश्चित कर दी जाती है साथ ही कंपनियों द्वारा कन्वर्टिबल डिबेंचर और नॉन कन्वर्टिबल डिबेंचर्स पर अलग-अलग ब्याज दी जाती है और सामान्यतया कंपनियां बैंक की तुलना में डिबेंचर पर कम ब्याज देती हैं जैसे सामान्यतया कंपनियां डिबेंचर्स पर 12 पर्सेंट के आसपास ब्याज देती हैं जबक अगर कंपनियां मार्केट से या बैंक से लोन लेते हैं तो कंपनियों को कभी-कभी 17पर्सेंट तक भी ब्याज देना पड़ता है तो इस प्रकार यह ब्याज दर कंपनी के लिए किसी बैंक आदि से लोन लेने से कुछ कम ही पड़ता है
जब कंपनी किसी बैंक निगम से लोन लेती है तो उसकी किस्त बन जाती है जो उसे हर महीने चुकानी होती है और यह किस थोड़े दिनों बाद ही शुरू हो जाती है जिसमें कुछ पैसा ब्याज का और कुछ मूलधन का हर महीने उसे देना होता है जबकि वेंचर जारी करने में कंपनी को यह फायदा होता है कि कंपनी से 3 साल या 5 साल या 7 साल जैसी लंबी अवधि के लिए जारी करती है और उसे इस पैसे का भुगतान इतने लंबे समय के बाद करना होता है तो कंपनी को एक लंबा समय मिल जाता है उस पूंजी से अपना कार्य करने में आसानी होती है
कंपनियां डिबेंचर्स का पूर्ण भुगतान कर देती हैं तो उसके बाद उसके दायित्व से मुक्त हो जाती हैं जब अगर कंपनी इक्विटी शेयर जारी करती है तो उसकी रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी उसका दायित्व कंपनी के ऊपर हमेशा बना ही रहता है जब भी कंपनी को कोई भी निर्णय लेना है तो उसमें वोटिंग राइट्स भी देना पड़ता है और कोई भी लाभ होने पर उसका डिविडेंड हमेशा पे करना पड़ता है
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